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हिचकी फिल्म 2018 रिव्यू रानी मुखर्जी


‘हिचकी’ इसी प्रॉब्लम से जूझने वाली एक लड़की की कहानी है. लड़की का नाम है नैना माथुर (रानी मुखर्जी). उसका सपना टीचर बनने का है. अठारह स्कूलों में उसे इस सिंड्रोम की वजह से नौकरी नहीं मिल पाई. आखिर में जिस स्कूल से वो पढ़कर निकली है, सैंट नॉटकर्स अकैडमी, वहीं उसे बतौर टीचर रख लिया जाता है. कुछ ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए जो मजबूरन उस स्कूल का हिस्सा हैं. मजबूरन क्यों, ये बात आपको फिल्म देखने पर पता लगेगी. खैर, वो स्लम के बच्चे हैं और इस हाई-फाई स्कूल में फिट नहीं हो पा रहे हैं. उनके लिए बने अलग सेक्शन से पिछले आठ महीनों में सात टीचर निकाले जा चुके हैं. नैना आठवीं है. वो बच्चे किन मायनों में अलग हैं. वो पढ़कर नहीं देखकर ही समझ आएगा. नैना को अब अपनी बीमारी के साथ-साथ उन बच्चों के लिए भी लड़ना है. इसमें ये बच्चे कितना कॉपरेट करते हैं, इस सिंड्रोम की वजह से नैना की लाइफ में और क्या और कैसी दिक्कतें हैं, उसे भी फिल्म में शामिल किया गया है. सीधी भाषा में कहें तो ‘हिचकी’ अपनी कमजोरी से शर्मिंदा या निराश होने के बजाय उसे अपनी ताकत में तब्दील करने की कहानी है. ये शिक्षा के अधिकार (राइट टु एजुकेशन) के विषय को भी एक पल के लिए ही सही लेकिन छूती है.

‘हिचकी’ ब्रैड कोहेन की किताब ‘फ्रंट ऑफ द क्लास: हाउ टूरेट सिंड्रोम मेड मी द टीचर आई नेवर हैड’ (Frоnt оf thе Сlаss: Ноw Тоurеttе Ѕуndrоmе Маdе Ме thе Теасhеr І Νеvеr Наd) पर बेस्ड है. ये फिल्म की शुरुआत में बताया भी जाता है. लेकिन इसका भारतीयकरण बहुत कायदे से किया गया है. फिल्म देखते वक्त आप दुखी होते हुए भी हंसते रहते हैं. आपको रानी से बहुत हमदर्दी होती है, ये जानते हुए कि उन्हें इसकी दरकार कतई नहीं है. फिल्म अच्छी रफ्तार से बढ़ते हुए पहले हाफ में अपने सभी किरदारों और स्थितियों को स्थापित कर लेती है. दूसरा हाफ थोड़ा सा धीला लगना अभी शुरू ही होता है कि डैमेज कंट्रोल कर लिया जाता है. कई सारे लूपहोल्स होने के बावजूद आप फिल्म से संतुष्ट होते हैं. सबसे ज़्यादा इमोशनल लेवल पर. और ये इंस्पायर भी करती है. लेकिन इसे सिर्फ इंस्पिरेशनल और ज्ञानप्रद होने से इसे बचाती है इसकी कसी हुई कहानी.

 

फिल्म में एक सीन है जहां क्लास के बच्चे नैना के इस सिंड्रोम का मजाक बनाते हैं. वो रैप गाकर उनकी इस दिक्कत का मजाक उड़ाने या क्लास छोड़कर जाने के लिए मजबूर करते हैं. यहां रानी भी उनके इस रैप का हिस्सा बन जाती हैं. ये सीन आपको बता देती है कि आप आगे फिल्म में क्या-क्या देखने वाले हैं. ‘हिचकी’ देखते वक्त आपको ‘तारे ज़मीन पर’ की भी याद आती है. अंतर बस इतना है कि वहां समस्या बच्चे में थी लेकिन यहां टीचर में है. लेकिन जब फिल्म खत्म होती है आपको लगने और होने में फर्क समझ आ जाता है.

एक समय के बाद फिल्म में रानी के टूरेट सिंड्रोम को बिलकुल दरकिनार सा कर दिया जाता है, जो खलने लगता है. एक बात जो सबसे अच्छी है वो ये कि इसमें ऐसा कोई सीन नहीं है, जो आपको लगे कि एक्सट्रा है या बोर कर रहा है. चीज़ें बिलकुल कट टू कट और सुलझी हुई हैं. मतलब एडिटिंग बिलकुल टाइट है. इसीलिए फिल्म की लंबाई पूरे दो घंटे भी नहीं है. और ये फैक्टर बेशक इस फिल्म को देखने के एक्पीरियंस को रिच बनाती है. इस फिल्म के डायलॉग्स बहुत कमाल के हैं. एकदम रियलिस्टिक, जिससे आप फिल्म से और अच्छे से कनेक्ट कर पाते हैं. पूरी संवेदनशीलता के साथ.

 

फिल्म में एक सीन है, जहां रानी इंटरव्यू दे रही होती हैं. इंटरव्यू लेने वाले पैनल से एक आदमी नैना को सलाह देता है कि उन्हें टीचिंग के अलावा किसी और फील्ड में जॉब के लिए ट्राय करना चाहिए इस पर नैना जो जवाब देती हैं-

इस फिल्म के जितने भी डिपार्टमेंट है उनमें अच्छा काम किया गया है. देखते हुए दर्शक को कोई हिचकी नहीं आती. ये चीज़ आपको सबसे ज़्यादा म्यूज़िक में दिखाई देती है. गाने कोई भी ऐसे नहीं हैं जो आपको याद रह जाए और आप उसे हॉल से निकलने के बाद भी गुनगुनाते रहें. लेकिन वो फिल्म में इतने अच्छे से रखे गए हैं कि मिसफिट नहीं लगते. फिल्म में म्यू़ज़िक जसलीन रॉयल का है. जसलीन रॉयल वही हैं, जिनका गाना विराट-अनुष्का की शादी में बज रहा था.

रानी मुखर्जी कहीं भी ये महसूस नहीं होने देती कि वो नैना माथुर नहीं है. ‘मर्दानी’ को आए चार साल हो गए लेकिन उनके अभिनय में कोई गैप नज़र नहीं आता. वो अपने रोल में फिट हैं. नीरज कबी ने वाडिया नाम के एक टीचर का रोल किया है. उनका अभिनय भी अच्छा है. उनका काम हम पहले भी ‘तलवार’ और ‘शिप ऑफ थीसियस’ जैसी फिल्मों में देख चुके हैं. उन्हें अपना काम पता होता है. लेकिन सरप्राइज़ हैं वो चौदह बच्चे. वो बहुत रियल लगते हैं फिल्म में. बाकी सब फर्स्ट क्लास है. अगर आपकी भी कोई कमज़ोरी है, जिसे दूर करने में दिक्कत आ रही है. मोटिवेशन की कमी है. तो ‘हिचकी’ देख आइए. कृपा वहीं रुकी हुई है.

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